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वट सावित्री व्रत महत्व और शुभ मुहूर्त संपूर्ण पौराणिक कथा

वट सावित्री व्रत: महत्व और शुभ मुहूर्त संपूर्ण पौराणिक कथा

वट सावित्री व्रत: महत्व और शुभ मुहूर्त

वट सावित्री का व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाया जाता है। यह व्रत पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना के लिए किया जाता है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, इस दिन बरगद (वट) के वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है क्योंकि इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का वास माना जाता है।

वट सावित्री व्रत कथा (Vat Savitri Vrat Katha)

पौराणिक कथा के अनुसार, मद्र देश के राजा अश्वपति की कन्या सावित्री ने अपनी बुद्धि और पतिव्रत धर्म से यमराज को भी पराजित कर दिया था।

  1.  सत्यवान और सावित्री का विवाह: सावित्री ने राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना, जबकि नारद जी ने बताया था कि सत्यवान अल्पायु हैं।
  2.  यमराज का आगमन: विवाह के कुछ समय बाद जब सत्यवान की मृत्यु का समय आया, तो यमराज उनके प्राण लेने आए। सावित्री उनके पीछे-पीछे चल दीं।
  3.  तीन वरदान: सावित्री की निष्ठा देखकर यमराज ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने बड़ी चतुराई से अपने ससुर की आंखों की रोशनी, खोया हुआ राज्य और अंत में सौ पुत्रों की माता होने का वरदान मांग लिया।
  4.  सत्यवान का पुनर्जीवन: यमराज ने ‘तथास्तु’ कह दिया। चूंकि सावित्री एक पतिव्रता स्त्री थीं, इसलिए बिना सत्यवान के जीवित हुए उनका माता बनना संभव नहीं था। वचनबद्ध होने के कारण यमराज को सत्यवान के प्राण वापस करने पड़े |

वट सावित्री व्रत के नियम और सावधानियां

व्रत की सफलता के लिए इन नियमों का पालन करना अनिवार्य है:

  •  ब्रह्मचर्य और पवित्रता: व्रत के एक दिन पहले से ही मन और तन की शुद्धता का ध्यान रखें।
  •  श्रृंगार का महत्व: इस दिन सुहागिन महिलाओं को सोलह श्रृंगार करना चाहिए। पीला या लाल रंग पहनना शुभ माना जाता है।
  •  बरगद की परिक्रमा: पूजा के दौरान वट वृक्ष की 7, 11, 21, 51 या 108 बार परिक्रमा करनी चाहिए।
  •  भोजन के नियम: कई क्षेत्रों में इस दिन भीगे हुए चने और फल खाने का नियम है। नमक के सेवन से परहेज करना चाहिए।

पूजन सामग्री की सूची

पूजा शुरू करने से पहले इन सामग्रियों को एकत्रित कर लें:

  •  बांस का पंखा (बेना)
  •  कच्चा सूत (सफेद या लाल)
  •  धूप, दीप, अगरबत्ती और घी का दीपक
  •  भीगे हुए चने और मौसमी फल (आम, लीची)
  •  बरगद का फल या उसके कोपल
  • सुहाग का सामान (सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां)

स्टेप-बाय-स्टेप पूजा विधि

  1.  स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
  2.  स्थान का चयन: बरगद के पेड़ के नीचे जाकर स्थान को साफ करें और वहां सावित्री-सत्यवान की प्रतिमा स्थापित करें।
  3.  अर्पण: जल, पुष्प, और अक्षत अर्पित करें। चने और गुड़ का भोग लगाएं।
  4.  सूत लपेटना: कच्चा सूत लेकर पेड़ के चारों ओर परिक्रमा करते हुए बांधें।
  5.  कथा श्रवण: हाथ में भीगे चने लेकर वट सावित्री की कथा सुनें या पढ़ें।
  6.  आरती और दान: पूजा के बाद पंखे से हवा करें और ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान दें।

वट सावित्री व्रत की संपूर्ण पौराणिक कथा (Vat Savitri Vrat Full Story)

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह कथा पतिव्रता शिरोमणि माता सावित्री और उनके पति सत्यवान के अटूट प्रेम और विश्वास पर आधारित है।

1. सावित्री और सत्यवान का विवाह

प्राचीन काल में मद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए 18 वर्षों तक कठिन तपस्या की, जिसके फलस्वरूप उन्हें ‘सावित्री’ नाम की कन्या प्राप्त हुई। सावित्री जब विवाह योग्य हुई, तो उन्होंने तपोवन में रह रहे निर्वासित राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना।

2. नारद जी की भविष्यवाणी

जब देवर्षि नारद को इस विवाह के बारे में पता चला, तो उन्होंने राजा अश्वपति को चेतावनी दी। नारद जी ने बताया कि सत्यवान गुणी और धर्मात्मा तो हैं, लेकिन वे अल्पायु हैं और ठीक एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। राजा ने सावित्री को बहुत समझाया, लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं। अंततः दोनों का विवाह संपन्न हुआ।

3. कठिन तप और मृत्यु का दिन

विवाह के बाद सावित्री अपने राजसी सुख त्याग कर ससुराल में सेवा करने लगीं। जैसे-जैसे सत्यवान की मृत्यु का दिन करीब आने लगा, सावित्री ने तीन दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी, उस दिन वह अपने पति के साथ जंगल में लकड़ियां काटने गईं।
जंगल में लकड़ी काटते समय सत्यवान के सिर में अचानक तेज दर्द हुआ और वे सावित्री की गोद में सिर रखकर वट (बरगद) के वृक्ष के नीचे लेट गए। उसी क्षण यमराज स्वयं सत्यवान के प्राण लेने वहां पहुंचे।

4. यमराज और सावित्री का संवाद

यमराज सत्यवान के प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दीं। यमराज ने उन्हें वापस जाने को कहा, लेकिन सावित्री ने तर्क दिया कि जहाँ पति जाते हैं, पत्नी का धर्म भी वहीं तक साथ देना है। सावित्री की बुद्धिमत्ता और पतिभक्ति से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा (पति के प्राणों को छोड़कर)।

पहला वरदान: सावित्री ने अपने अंधे ससुर की आँखों की ज्योति मांगी।
दूसरा वरदान: उन्होंने अपने ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा।
तीसरा वरदान: सावित्री ने यमराज से ‘सौ पुत्रों की माता’ बनने का वरदान मांगा।

5. यमराज की विवशता और विजय

यमराज ने बिना सोचे-समझे ‘तथास्तु’ कह दिया। तब सावित्री ने विनम्रतापूर्वक कहा, “हे प्रभु! आप धर्मराज हैं। आपने मुझे पुत्रवती होने का वरदान दिया है, लेकिन मेरे पति के प्राण आपके पास हैं। बिना पति के मैं माता कैसे बन सकती हूँ?”

यमराज अपनी ही बातों के जाल में फंस गए और सावित्री की दृढ़ता देख द्रवित हो उठे। उन्होंने सत्यवान के प्राण वापस कर दिए और सावित्री को अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया।

वट वृक्ष का महत्व (Importance of Banyan Tree)

मान्यता है कि जब सावित्री अपने पति के प्राण वापस लेकर आईं, तब सत्यवान उसी वट वृक्ष के नीचे जीवित हुए थे। इसीलिए इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं और उसके चारों ओर सूत लपेटकर परिक्रमा करती हैं।

वट सावित्री व्रत: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. वट सावित्री व्रत में बरगद के पेड़ की ही पूजा क्यों की जाती है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट (बरगद) के वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास होता है। साथ ही, सावित्री ने इसी वृक्ष के नीचे अपने पति सत्यवान के प्राण वापस पाए थे। आयुर्वेद की दृष्टि से भी यह वृक्ष दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है।

2. क्या कुंवारी कन्याएं वट सावित्री का व्रत रख सकती हैं?

जी हाँ, कुंवारी कन्याएं भी अच्छे वर की प्राप्ति और सुखद भविष्य के लिए यह व्रत रख सकती हैं। वे भी विधि-विधान से पूजा कर सकती हैं, जिससे उन्हें भविष्य में अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

3. वट सावित्री व्रत की परिक्रमा कितनी बार करनी चाहिए?

शास्त्रों के अनुसार, वट वृक्ष की कम से कम 7 बार परिक्रमा करना अनिवार्य है। हालांकि, अपनी श्रद्धा और संकल्प के अनुसार महिलाएं 11, 21, 51 या 108 बार भी परिक्रमा कर सकती हैं। परिक्रमा करते समय कच्चा सूत लपेटा जाता है।

4. वट सावित्री व्रत में किस रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है?

इस पावन अवसर पर सुहागिन महिलाओं को लाल, पीला, हरा या नारंगी रंग के वस्त्र पहनना चाहिए। ये रंग सौभाग्य और खुशहाली के प्रतीक माने जाते हैं। इस दिन काले या गहरे नीले रंग के कपड़े पहनने से बचना चाहिए।

5. यदि पास में बरगद का पेड़ न हो तो पूजा कैसे करें?

अगर आपके घर के पास बरगद का पेड़ नहीं है, तो आप गमले में बरगद की एक छोटी टहनी लगाकर उसकी पूजा कर सकते हैं। इसके अलावा, दीवार पर बरगद के पेड़ का चित्र बनाकर भी मानसिक पूजा की जा सकती है।

6. वट सावित्री व्रत का पारण (व्रत खोलना) कैसे करें?

पूजा संपन्न होने के बाद, बरगद के फल (कोपल) और भीगे हुए चने निगलकर व्रत खोला जाता है। इसके बाद घर के बड़ों का आशीर्वाद लेना चाहिए और सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।

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